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होलाष्टक के दौरान क्यों नहीं होते शुभ कार्य? जानिए इस अशुभ काल का धार्मिक महत्व

हिंदू धर्म में होलाष्टक का विशेष महत्व, मांगलिक कार्यों पर रहती है रोक

होलाष्टक के दौरान क्यों नहीं होते शुभ कार्य? जानिए इस अशुभ काल का धार्मिक महत्व
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हिंदू धर्म में होली से पहले के आठ दिनों को होलाष्टक के नाम से जाना जाता है, जिसे परंपरागत रूप से अशुभ काल माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस अवधि में ग्रहों की स्थिति अनुकूल नहीं रहती, जिसके कारण किसी भी प्रकार के शुभ या मांगलिक कार्य करना वर्जित होता है। यही वजह है कि होलाष्टक के आरंभ होते ही विवाह, सगाई और अन्य संस्कारों से जुड़ी गतिविधियों पर रोक लग जाती है।


धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं में माना जाता है कि होलाष्टक के दौरान चंद्रमा समेत कई ग्रह उग्र अवस्था में होते हैं, जिससे नकारात्मक प्रभाव बढ़ सकता है। इस समय किए गए शुभ कार्यों का फल अपेक्षा के अनुरूप नहीं मिलता, इसलिए समाज में इस अवधि को संयम और साधना का समय माना गया है। लोग इस दौरान पूजा-पाठ, जप-तप और आत्मचिंतन को अधिक महत्व देते हैं।


होलाष्टक के दिनों में विशेष रूप से शादी-विवाह, सगाई, मुंडन, नामकरण संस्कार और गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्य पूरी तरह निषिद्ध माने जाते हैं। धार्मिक विशेषज्ञों के अनुसार, इन कार्यों के लिए ग्रहों की अनुकूलता आवश्यक होती है, जो होलाष्टक के समय नहीं मानी जाती। इसी कारण अधिकांश पंचांगों में भी इन दिनों को शुभ कार्यों के लिए अनुपयुक्त बताया गया है।


होलाष्टक समाप्त होने के बाद होली का पर्व आता है, जिसे बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। इसके साथ ही शुभ कार्यों पर लगी रोक भी समाप्त हो जाती है और विवाह व अन्य मांगलिक कार्यक्रमों की शुरुआत दोबारा होने लगती है। इस तरह होलाष्टक न केवल एक धार्मिक परंपरा है, बल्कि यह जीवन में धैर्य और संतुलन बनाए रखने का भी संदेश देता है।

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