महोबा में सरकारी विभाग का अजब कारनामा: क्या परलोक जा चुकी कर्मचारी भी आकर देगी अपनी हाजिरी?
सिस्टम की फाइलों में जिंदा है वो शख्स जो दुनिया छोड़ चुका है, अब अल्टीमेटम ने खड़ा किया बड़ा सवाल.

उत्तर प्रदेश के महोबा जिले से प्रशासनिक लापरवाही का एक ऐसा विचित्र और संवेदनहीन मामला सामने आया है, जिसने सरकारी कार्यप्रणाली पर गंभीर सवालिया निशान लगा दिए हैं। यहां बाल विकास विभाग के गलियारों से निकला एक सरकारी नोटिस इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है, क्योंकि यह किसी जीवित व्यक्ति के लिए नहीं बल्कि उस महिला कर्मचारी के नाम जारी किया गया है जिसका देहांत हुए करीब डेढ़ साल बीत चुके हैं। विभाग की इस 'जादुई' सक्रियता ने न केवल मृतक के परिजनों के जख्मों को कुरेदने का काम किया है, बल्कि यह भी उजागर कर दिया है कि अफसरशाही के रजिस्टर और जमीनी हकीकत के बीच कितनी गहरी खाई मौजूद है। पनवाड़ी विकासखंड के अंतर्गत आने वाले नैपुरा गांव का यह प्रकरण अब जिले भर में विभाग की भारी किरकिरी करा रहा है।
पूरे मामले की कड़वी सच्चाई तब उजागर हुई जब मृतका पार्वती के पति किशुनलाल के पास बाल विकास परियोजना कार्यालय का एक पत्र पहुंचा। इस पत्र में बाल विकास परियोजना अधिकारी यासमीन जहां के हस्ताक्षर थे और इसमें मृत महिला पर ड्यूटी से नदारद रहने का आरोप लगाया गया था। विभाग ने अपनी जांच में पाया कि निरीक्षण के दौरान आंगनबाड़ी केंद्र बंद था, जिसके बाद मृतक पार्वती को दो दिन का समय देते हुए कार्यालय में पेश होने का आदेश दिया गया। हैरानी की बात यह है कि पार्वती की मृत्यु 1 नवंबर 2024 को बीमारी के चलते हो गई थी और उनके पति का दावा है कि उन्होंने मृत्यु के महज आठ दिन बाद ही विभाग को डेथ सर्टिफिकेट और आधिकारिक सूचना सौंप दी थी। इसके बावजूद, लगभग 18 महीनों तक चैन की नींद सो रहे विभाग ने अब मृतका को सेवा समाप्ति की चेतावनी भरा नोटिस थमा दिया है।
प्रशासनिक लापरवाही का आलम यह है कि नोटिस में न केवल हाजिरी मांगी गई है, बल्कि 'हॉट-कुक्ड' योजना से जुड़े महत्वपूर्ण बिल-वाउचर और सरकारी रिकॉर्ड्स के साथ उपस्थित होने का अल्टीमेटम भी दिया गया है। पीड़ित पति अब हाथ में पत्नी की तस्वीर और मृत्यु प्रमाण पत्र लेकर अधिकारियों के चक्कर काट रहा है, यह साबित करने के लिए कि उसकी पत्नी अब इस दुनिया में नहीं है। यह घटना दर्शाती है कि सरकारी आंकड़ों के प्रबंधन में कितनी बड़ी चूक हो रही है, जहां एक मृत व्यक्ति को न केवल जिंदा मान लिया गया बल्कि उसे जवाबदेही के कटघरे में भी खड़ा कर दिया गया। फिलहाल इस मामले के तूल पकड़ने के बाद उच्चाधिकारियों की चुप्पी और विभाग की कार्यशैली को लेकर स्थानीय निवासियों में काफी रोष देखा जा रहा है।
