इस वर्ष किस तारीख को मनाई जाएगी होली? जानिए, ज्योतिषाचार्यों की राय
Holi will be celebrated on March 4 in Varanasi due to lunar eclipse and sutak period. Holika Dahan on March 2 as per astrologers.

काशी में एक दिन आगे खिसकी होली
Holi का पर्व आमतौर पर होलिका दहन के अगले दिन मनाया जाता है, लेकिन इस वर्ष तिथि और चंद्रग्रहण के विशेष संयोग के कारण काशी में होली एक दिन आगे खिसक गई है। काशी के ज्योतिषाचार्यों के अनुसार इस बार रंगों का पर्व 3 मार्च के बजाय 4 मार्च को मनाया जाएगा।
पूर्णिमा तिथि और होलिका दहन का समय
दैनिक जागरण में प्रकाशित समाचार के अनुसार काशी हिंदू विश्वविद्यालय के ज्योतिष विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. विनय कुमार पांडेय ने बताया कि फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा का प्रारंभ 2 मार्च को शाम 5 बजकर 21 मिनट से होगा और समापन 3 मार्च को शाम 4 बजकर 34 मिनट पर होगा। इस तिथि में प्रदोष और रात्रि व्यापिनी पूर्णिमा का संयोग बन रहा है। शास्त्रसम्मत मान्यता के अनुसार भद्रा के मुखकाल को छोड़ते हुए होलिका दहन 2 मार्च की रात को ही किया जाएगा।
चंद्रग्रहण बना कारण
सामान्य परिस्थितियों में होलिका दहन के अगले दिन होली खेली जाती है, लेकिन इस बार 3 मार्च को सायंकाल ग्रस्तोदित चंद्रग्रहण पड़ रहा है। यह ग्रहण शाम 5 बजकर 59 मिनट से 6 बजकर 48 मिनट तक रहेगा। इसका सूतक काल दोपहर 3 बजकर 20 मिनट से प्रारंभ हो जाएगा।
सूतक काल में उत्सव वर्जित
शास्त्रों के अनुसार सूतक काल के दौरान जप, तप और मंत्र साधना के अतिरिक्त किसी भी प्रकार के शुभ या उत्सव संबंधी कार्य वर्जित माने जाते हैं। प्रो. पांडेय के अनुसार भले ही ग्रहण सूर्यास्त के बाद प्रभावी माना जाए, लेकिन सूतक लगते ही रंगोत्सव की तैयारियां भी नहीं की जातीं।
4 मार्च को मनाई जाएगी होली
ग्रहण काल में भोजन, उत्सव और उल्लास से जुड़े आयोजन निषिद्ध माने जाते हैं। इसी कारण काशी के विद्वानों ने सर्वसम्मति से निर्णय लिया है कि इस वर्ष होली का रंगोत्सव 4 मार्च को मनाया जाए, ताकि धार्मिक मर्यादा और शास्त्रीय नियमों का पालन हो सके।
शास्त्र और खगोलीय घटनाओं का महत्व
काशी के ज्योतिषाचार्यों का कहना है कि पर्व और त्योहार केवल परंपरा नहीं, बल्कि शास्त्रीय नियमों और खगोलीय स्थितियों से भी जुड़े होते हैं। चंद्रग्रहण जैसी खगोलीय घटनाओं का धार्मिक जीवन में विशेष महत्व होता है, इसलिए इनका ध्यान रखना आवश्यक है।
परंपरा और उल्लास दोनों बरकरार
होलिका दहन बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है, जबकि रंगोत्सव आपसी प्रेम, सौहार्द और सामाजिक समरसता का संदेश देता है। इस बार तिथि में बदलाव जरूर हुआ है, लेकिन होली का उल्लास और उमंग पहले की तरह ही बनी रहेगी। काशी में यह पर्व धार्मिक अनुशासन और सांस्कृतिक चेतना के साथ मनाया जाएगा।
