धर्मेंद्र की आखिरी फिल्म ‘इक्कीस’ ने रुलाया दर्शकों को, शांति और संवेदनशीलता से भरी वॉर बायोपिक

हिंदी सिनेमा के दिग्गज अभिनेता धर्मेंद्र की आखिरी फिल्म मानी जा रही ‘इक्कीस’ इन दिनों दर्शकों के बीच गहरी भावनात्मक छाप छोड़ रही है। श्रीराम राघवन के सधे हुए निर्देशन में बनी यह फिल्म पारंपरिक युद्ध फिल्मों से अलग राह चुनती है। इसमें न तो बेवजह का शोर है और न ही उग्र राष्ट्रवादी तेवर, बल्कि कहानी को संवेदनशीलता, संयम और आत्ममंथन के साथ पेश किया गया है। यही वजह है कि फिल्म देखने के बाद दर्शक सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि एक गहरा अनुभव लेकर थिएटर से बाहर निकलते हैं।
फिल्म ‘इक्कीस’ भारत के सबसे कम उम्र के परमवीर चक्र विजेता सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल के जीवन से प्रेरित है। कहानी उनके साहस, कर्तव्यनिष्ठा और बलिदान के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसे निर्देशक ने बेहद सादगी और ईमानदारी के साथ पर्दे पर उतारा है। युद्ध के दृश्य भले ही तीव्र हों, लेकिन फिल्म का असली प्रभाव उन पलों में नजर आता है, जहां सैनिकों के मन के भीतर चल रही उथल-पुथल और देश के प्रति उनका निस्वार्थ समर्पण सामने आता है। यही तत्व फिल्म को भावुक और प्रभावशाली बनाते हैं।
धर्मेंद्र की मौजूदगी इस फिल्म को खास बनाती है। यह उनकी आखिरी फिल्मों में से एक मानी जा रही है और पर्दे पर उनका शांत, गंभीर और अनुभव से भरा अभिनय दर्शकों को भीतर तक छू जाता है। हर सीन में उनका किरदार दर्द, गर्व और जिम्मेदारी की भावना को एक साथ व्यक्त करता है। दर्शकों का कहना है कि धर्मेंद्र ने अपने अभिनय से बिना ज्यादा संवाद बोले भी भावनाओं को बखूबी व्यक्त किया है, जो फिल्म को और अधिक प्रभावशाली बना देता है।
श्रीराम राघवन का निर्देशन इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकतों में से एक है। उन्होंने युद्ध को महज हथियारों और गोलियों की कहानी न बनाकर इंसानी संवेदनाओं और नैतिक मूल्यों से जोड़ा है। फिल्म यह सवाल भी उठाती है कि देशभक्ति का असली मतलब क्या है और बलिदान का मूल्य कैसे समझा जाए। यही वजह है कि ‘इक्कीस’ केवल एक वॉर ड्रामा नहीं, बल्कि एक सोचने पर मजबूर करने वाली सिनेमाई प्रस्तुति बन जाती है।
कुल मिलाकर, ‘इक्कीस’ ऐसी फिल्म है जो दर्शकों को भावुक कर देती है और साथ ही गर्व की अनुभूति भी कराती है। यह उन फिल्मों में शामिल होती नजर आ रही है, जो लंबे समय तक याद रखी जाएंगी। धर्मेंद्र के करियर की यह अहम फिल्म उनके प्रशंसकों के लिए एक भावनात्मक विदाई की तरह है, वहीं अरुण खेत्रपाल की कहानी नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत बनकर सामने आती है।
